सहज शब्द की उत्पति

सहज शब्द संस्कृत के दो शब्दों को जोड़ कर बना है, ‘सह’ और ‘जा’। सह का अर्थ है ‘साथ’ और ‘जा’ का अर्थ है ‘जन्म’। जब यह दोनों शब्द एक साथ मिल जाते हैं तो इसको अर्थ प्रकृति के करीब हो जाता है। सहज योग के अनुयाईयों का विश्वास है कि इससे उनके अंदर कुंडलिनी का जन्म होता है और वे उन्हें स्वत: जागृत कर सकते हैं।

चिकित्सकों ने सहज योगा के अन्य प्रभावों के बारे में भी बताया है। उनके अनुसार योग को करने से लोगों में शारीरिक व मानसिक तनाव से मुक्ति व आराम मिलता है। साथ ही शरीर में होने वाली बीमारियों को जड़ को खत्म किया जा सकता है।

सहज योग क्या है

सहज योग की खोज निर्मला श्रीवास्तव ने की, उन्‍हें ‘श्री माता जी निर्मला देवी’ के नाम से भी जाना जाता हैं। सहज योगा में कुंडलिनी जागरण व निर्विचार समाधि, मानसिक शांति से लोगों को आत्मबोध होता है और अपने आप को जानने में मदद मिलती है। माता निर्मला देवी द्वारा विकसित इस योग को मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद फायदेमंद माना जाता है।

 

सहजयोग क्या है ?

बीजों का अंकुरण , फूलों का खिलना और फलों का पकना हम सब प्रतिदिन देखते है, परन्तु हम यह नहीं सोचना चाहते है की यह सब किस प्रकार घटित होता है l एक शक्ति है जो इस कार्य को करती है l यह दैवीय प्रेम की शक्ति है l अपने आंतरिक यन्त्र के माध्यम से इस शक्ति को अनुभव करने का समय अब आ गया है l स्त्रोत से जुड़े बिना इस यन्त्र का कोई उपयोग नहीं है l अपने सामर्थ्य और सुंदरता का हमें ज्ञान नहीं , परन्तु एक बार जब हमारा सम्बन्ध अपने स्त्रोत के साथ स्थापित हो जाता है तो अद्भुत परिवर्तन हमें आश्चर्यचकित कर देते है , सर्वप्रथम हमें यह समझना है की यह सम्बन्ध बौद्धिक नहीं है l फिर भी मानवीय चेतना को सहजयोग द्वारा उच्चस्तर पर विकसित किया जा सकता है , क्योकि सहजयोग मेन्टल प्रोजेक्शन मात्र नहीं है l यह एक घटना है हमारे विकास की यह अंतिम सीढ़ी है l

सहजयोग आज का महायोग

सहजयोग संस्थापिका परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी –
मनुष्य की बुद्धि स्वतंत्र है I परमेश्वर ने उन्हें स्वतंत्रता दी है I उसे अद्भुत शक्ति का ज्ञान हो यही उस विराट परमेश्वर की इच्छा है Iअब तक सहजयोग में बहुत से लोग सहज ही पार हुए है I अब सहजयोग एक ऊंचाई पर आकर टिका है Iउसे आपको महायोग कहना होगाI जब तक कुण्डलिनी शक्ति जागृत होकर ब्रह्मरन्द्र का छेदन नहीं करती तब तक योग हुआ कैसे कह सकते है ? अब तक जितने भी योग के वर्णन है वे सारे योग की पूर्व तयारी है I परन्तु सहजयोग में जिस समय कुण्डलिनी शक्ति का उत्थान होता है उस समय ये सारे योग अपने आप घटित होते है Iकुण्डलिनी शक्ति सहस्त्रार तक आती है और जिस समय कुण्डलिनी शक्ति सहस्त्रार में आकर ब्रह्मरन्द्र का छेदन करती है उस समय ‘महायोग’ घटित होता है ,इसीलिए सहजयोग जो अनादि है वह आपके साथ ही जन्म लेता है और आपके साथ ही अनेक जन्मो से चलकर आया है इसे महायोग मानना चाहिए I आप सभी ‘महायोग ‘ पाने की स्थिति में पहुंच चुके है अब आपके गुरुतत्व के फलित होने का समय आया है I पहले सद्गुरु दो तीन शिष्य रखते थे परन्तु जब तक यह बात सर्वसामान्य मनुष्य तक ,सारे जनसमुदाय तक नहीं पहुँचती तब तक उसका क्या अर्थ है ? अब यह ज्ञान आम जनता तक पहुँचाने का समय आ गया है , क्योकि आपकी अंतर्रचना ज्ञान मिलने के लिए परिपक्व है केवल स्त्रोत से जुड़ना बाकी है I